Tuesday, May 20, 2008

दस ग़ज़लें – रामकुमार कृषक

इस पोस्ट के सभी चित्र : अवधेश मिश्र

एक


चेहरे तो मायूस मुखौटों पर मुस्कानें दुनिया की
शो-केसों में सजी हुईं खाली दुकानें दुनिया की

यों तो जीवन के कालिज में हमने भी कम नहीं पढ़ा
फिर भी सीख न पाए हम कुछ खास जुबानें दुनिया की

हमने आँखें आसमान में रख दीं खुल कर देखेंगे
कंधों से कंधों पर लेकिन हुईं उड़ानें दुनिया की

इन्क़लाब के कारण हमने जमकर ज़िन्दाबाद किया
पड़ीं भांजनी तलवारों के भ्रम में म्यानें दुनिया की

हमने जो भी किया समझवालों को समझ नहीं आया
खुद पर तेल छिड़ककर निकले आग बुझाने दुनिया की

बड़े-बड़े दिग्गज राहों पर सूँड घुमाते घूम रहे
अपनी ही हस्ती पहचानें या पहचानें दुनिया की

फूट पसीना रोआँ-रोआँ हम पर हँसता कहता है
क्या खुद को ही दफनाने को खोदीं खानें दुनिया की
0

दो


घेर कर आकाश उनको पर दिए होंगे
राहतों पर दस्तख़त यों कर दिए होंगे

तोंद के गोदाम कर लबरेज़ पहले
वायदों से पेट खाली भर दिए होंगे

सिल्क खादी और आज़ादी पहनकर
कुछ बुतों को चीथड़े सी कर दिए होंगे

हों न बदसूरत कहीं बँगले-बगीचे
बेघरों को जंगलों में घर दिए होंगे

प्रश्नचिह्नों पर उलट सारी दवातें
जो गए-बीते वो संवत्सर दिए होंगे

गोलियाँ खाने की सच्ची सीख देकर
फिर तरक्क़ी के नए अवसर दिए होंगे

तीन


आज तो मन अनमना गाता नहीं
खुद बहल औरों को बहलाता नहीं

आदमी मिलना बहुत मुश्किल हुआ
और मिलता है तो रह पाता नहीं

गलतियों पर गलतियाँ करते सभी
गलतियों पर कोई पछताता नहीं

दूसरों के नंगपन पर आँख है
दूसरों की आँख सह पाता नहीं

मालियों की भीड़ तो हर ओर है
किंतु कोई फूल गंधाता नहीं

सामने है रास्ता सबके मगर
रास्ता तो खुद कहीं जाता नहीं

धमनियों में खून के बदले धुआँ
हड्डियाँ क्यों कोई दहकाता नहीं

चार

हमने खुद को नकार कर देखा
आप अपने से हार कर देखा

जब भी आकाश हो गया बहरा
खुद में खुद को पुकार कर देखा

उनका निर्माण-शिल्प भी हमने
अपना खंडहर बुहार कर देखा

लोग पानी से गुज़रते हमने
सिर से पानी गुजार कर देखा

हमने इस तौर मुखौटे देखे
अपना चेहरा उतार कर देखा

पांच


आइए गांव की कुछ ख़बर ले चलें
आँख भर अपना घर खंडहर ले चलें

धूल सिंदूर-सी थी कभी माँग में
आज विधवा-सरीखी डगर ले चलें

लाज लिपटी हुई भंगिमाएँ कहाँ
पुतलियों में बसा एक डर ले चलें

एक सुबहा सुबकती-सिमटती हुई
साँझ होती हुई दोपहर ले चलें

देह पर रोज़ आँकी गई सुर्खियाँ
चीथड़े खून से तर-ब-तर ले चलें

राम को तो सिया मिल ही मिल जाएगी
मिल सकें तो जटायु के पर ले चलें

खेत-सीवान हों या कि हों सरहदें
चाक होते हुए सब्ज़ सिर ले चलें

राजहंसों को पाएँ न पाएँ तो क्या
संग उजड़ा हुआ मानसर ले चलें

देश दिल्ली की अँगुली पकड़ चल चुका
गाँव से पूछ लें अब किधर ले चलें

छह


आगाज़ अगर हो तो अंजाम तलक पहुँचें
कुछ इल्म मयस्सर हो,इहलाम तलक पहुँचें

सरनाम बस्तियों में दरिया नहीं है कोई
दरिया-ए-दिल मिलेंगे बेनाम तलक पहुँचें

रिंदों में सूफि़याना कुछ ढोंग भले कर लें
महफि़ल हो सूफि़यों की हम जाम तलक पहुँचें

तालाश नए घर की भटके हुए नहीं हैं
यह बात दूसरी है हम शाम तलक पहुँचें

केवल कहानियाँ ही कुर्बानियाँ नहीं हैं
पैग़ाम जिएँ मिटकर पैग़ाम तलक पहुँचें

सात


ऊँची कुर्सी काला चोगा यही कचहरी है
कोलाहल दीवारों जैसा चुप्पी गहरी है

चश्मा, टाई, कोट बगल में कुछ अंधीं आँखें
जिरह करेंगी देहातों से भाषा शहरी है

कहीं-कहीं पागें-टोपी सिर नंगे कहीं-कहीं
कहीं किसी सूरज के सिर पर छाया ठहरी है

नज़र एक-सी जिनकी उनको दुनिया खुदा कहे
यहाँ खुदा ऐसे हैं जिनकी नज़र इकहरी है

मकड़ी का जाला तो मकड़ी का घर-द्वारा है
मच्छर के डर से मानुष के लिए मसहरी है

ये कैसी अनबन चंदनवन ये आखिर कैसा
किसने विष ऐसा बांटा हर फीता ज़हरी है

आठ


ये खता तो हो गई है, की नहीं है जानकर
माफ भी कर दीजिए अब आप अपना मानकर

हम तो नदियों के किनारों पर पले, पीते रहे
आप ही दरअस्ल पीना जानते हैं छानकर

आपके हाथों की मेंहदी तो नुमाइश के लिए
हमने चूमे हाथ वो आए जो गोबर सानकर

जीतकर भी आपकी ही हार से बेचैन हम
आप हैं बैठे हुए हैं दुश्मनी-सी ठानकर

इस शहर में ठीक थे महफूज़ थे हम कल तलक
अब बहुत खतरे में लेकिन आपको पहचानकर

नौ

बतलाए देते हैं यूँ तो बतलाने की बात नहीं
खलिहानों पर बरस गए वो खेतों पर बरसात नहीं

नदियाँ रोकीं बांध बनाकर अपना घर-आंगन सींचा
औरों के घर डूबे फिर भी उनका कोई हाथ नहीं

धरती नापें तीन पगों में किले-कोठियों वाले लोग
जिनका राज-सुराज ख्वाब में भी उनके फुटपाथ नहीं

हुए धरम-पशु अपने-अपने धरम-गुरू तो चीज़ बड़ी
जिनके मंदिर-मस्जिद उनकी कोई जात-कुजात नहीं

कई बार देखा-परखा है हाथ मिला हमने उनको
वे तो उदघाटनकर्ता हैं, नींव रखें औकात नहीं

दस


बाखबर हम हैं मगर अखबार नहीं हैं
बाकलम खुद हैं मगर मुख्तार नहीं हैं

क्या कहा हमने भला इक शेर कह डाला अगर
कट गए वो और हम तलवार नहीं हैं

आप ही तो साथ थे अब आपको हम क्या कहें
जानते हैं रास्ते बटमार नहीं हैं

डूबिएगा शौक से हम तो डुबाने से रहे
हम नदी की धार हैं, मझधार नहीं हैं

आप चीज़ें चाहते हैं आपकी औकात है
हम कहीं तक शामिले-बाज़ार नहीं हैं

आज तक सूरज हमारी देहरी उतरा नहीं
चाहतों में हैं मगर स्वीकार नहीं हैं
0

वरिष्ठ कवि और ग़ज़लकार रामकुमार कृषक का जन्म 1 अक्टूबर 1943 को मुरादाबाद के गुलड़िया (पो. अमरोहा) उत्तर प्रदेश में हुआ था. आप हिन्दी में एम.ए. और साहित्यत्न हैं. कृषक जी की अब तक प्रकाशित कृतियां हैं: बापू(1969), ज्योति (1972), सुर्खियों के स्याह चेहरे (1977), नीम की पत्तियां(1984), फिर वही आकाश (1991), आदमी के नाम पर मज़हब नहीं(1991), मैं हूं हिंदुस्तान (1998) और, लौट आएंगी आंखें (2002) कविता पुस्तकें . एक कहानी संग्रह – नमक की डलियाँ (1980) और बच्चों तथा नवसाक्षरों के लिए सात अन्य पुस्तकें 'कर्मवाची शील" नामक संपादित कृति. 'अपजस अपने नाम' (शीघ्र प्रकाश्य गज़ल संग्रह). इसके अतिरिक्त विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों में सक्रिय हिस्सेदारी. जन संस्कृति मंच की दिल्ली इकाई के संस्थापक सदस्य. अनेक महत्वपूर्ण काव्य संग्रहों और पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. हिन्दी अकादमी, दिल्ली सहित कुछ अन्य संस्थाओं से पुरस्कृत - सम्मानित. 'अलाव' और 'नई पौध’ पत्रिकाओं का सम्पादन और प्रकाशन.

सम्पर्क : सी-3/59, सादतपुर विस्तार, दिल्ली - 110094
दूरभाष : 09868935366

Monday, April 21, 2008

दस कविताएं - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

इस पोस्ट के सभी चित्र : अवधेश मिश्र

(1) ओ चिरैया




ओ चिरैया !
कितनी गहरी
हुई है तेरी प्यास !

जंगल जलकर
ख़ाक हुए हैं
पर्वत –घाटी
राख हुए हैं ,
आँखों में
हरदम चुभता है
धुआँ-धुआँ आकाश ।

तपती
लोहे-सी चट्टानें
धूप चली
धरती पिंघलाने
सपनों में
बादल आ बरसे
जागे हुए उदास ।

उड़ी है
निन्दा जैसी धूल,
चुभन-भरे
पग-पग हैं बबूल
यही चुभन
रचती है तेरी –
पीड़ा का इतिहास ।


(2) इस सभा में चुप रहो




इस सभा में
चुप रहो
हुआ बहरों का
आगमन ।

ये खड़े हैं
आईने के सामने
यह जानते हैं –
अपने ही
दाग़दार
चेहरे नहीं पहचानते हैं ।
तर्क का
उत्तर बचा
केवल कुतर्कों
का वमन ।

बीहड़ से चल
हर घर तक
आ चुके हैं
भेड़िए ।
हैं भूख से
व्याकुल बहुत
इनको तनिक न
छेड़िए ।
लपलपाती
जीभ खूनी
ज़हर भरे इनके वचन ।

हलाल इनके
हाथ से
जनता हुई है
आजकल ।
काटते रहेंगे हमेशा
लूट-डाके की फ़सल ।
याद रखना
उतार लेंगे
लाश का भी
ये कफ़न ।


(3) लौटते कभी नहीं




लौटते कभी नहीं
आँसू में गाए दिन
ओस में नहाए दिन ।

सुधियों कि गोद में
रात-रात जागकर
भारी पलकों में सजे
उलझी अलकों में सजे
बीते जो तुम्हारे बिन
लौटते नहीं कभी ।

पहुँच किसी मोड़ पर
रिश्ते सभी छोड़कर
फिर दूर तक निहारते
उस प्यार को पुकारते
फिसले हाथ से जो छिन
लौटते कभी नहीं ।


(4) तुम बोना काँटे




तुम बोना काँटे
क्योंकि फूल न पास तुम्हारे।

बो सकते हो
वही सिर्फ़ जो
उगता दिल में,
चरण पादुका
ही बन सकते
तुम महफ़िल में।
न देव शीश पर चढ़ते काँटे
साँझ सकारे ।

हँसी किसी की
अरे पल भर भी
सह न पाते,
और बिलखता देख किसी को
तुम मुस्काते ।
जो डूबते
उनको देखा
बैठ किनारे।

जीवन देकर भी है हमने
जीवन पाया,
अपने दम से
रोता मुखड़ा
भी मुस्काया।
सौ­-सौ उपवन
खिले हैं मन में
तभी हमारे ।



(5) कहाँ गए?




कहाँ गए
वे लोग
इतने प्यार के,
पड़ गए
हम हाथ में
बटमार के।

मौत बैठी
मार करके कुण्डली
आस की
संझा न जाने
कब ढली
भेजता पाती न मौसम
हैं खुले पट
अभी तक दृग- द्वार के।

बन गई सुधियाँ सभी
रात रानी
याद आती
बात बरसों पुरानी
अब कहाँ दिन
मान के, मनुहार के।

गगन प्यासा
धूल धरती हो गई
हाय वह पुरवा
कहाँ पर सो गई
यशोधरा –सी
इस धरा को छोड़कर
सिद्धार्थ- से
बादल गए
इस बार के।


(6) दिन डूबा




दिन डूबा
नावों के
सिमट गए पाल।

खिंच गई नभ में
धुएँ की लकीर
चढ़ गई
तट पर
लहरों की पीर
डबडबाई
आँख- सा
सिहर गया ताल ।

थककर
रुक गई
बाट की ढलान,
गुमसुम
सो गया
चूर ­चूर गान
हिलते रहे
याद के दूर तक रूमाल।


(7) उदास छाँव




नीम पर बैठकर नहीं खुजलाता
कौआ अब अपनी पाँखें
उदास उदास है अब
नीम तले की शीतल छाँव ।

पनघट पर आती
कोई राधा
अब न बतियाती
पनियारी हैं आँखें
अभिशप्त से हैं अधर
विधुर-सा लगता सारा गाँव।

सब अपने में खोए
मर भी जाए कोई
छुपकर निपट अकेला
हर अन्तस् रोए
चौपालों में छाया
श्मशानी सन्नाटा
लगता किसी तक्षक ने
चुपके से काटा,
ठिठक ­ठिठक जाते
चबूतरे पर चढ़ते पाँव ।

न जवानों की टोली
गाती कोई गीत
हुए यतीम अखाड़े
रेतीली दीवार- सी
ढह गई
आपस की प्रीत
गली- गली में घूमता
भूखे बाघ -सा अभाव ।


(8) गाँव अपना




पहले इतना
था कभी न
गाँव अपना
अब पराया हो गया ।
खिलखिलाता
सिर उठाए
वृद्ध जो, बरगद
कभी का सो गया ।

अब न गाता
कोई आल्हा
बैठकर चौपाल में
मुस्कान बन्दी
हो गई
बहेलिए के जाल में

अदालतों की
फ़ाइलों में
बन्द हो ,
भाईचारा खो गया ।

दौंगड़ा
अब न किसी के
सूखते मन को भिगोता
और धागा
न यहाँ
बिखरे हुए मनके पिरोता

कौन जाने
देहरी पर
एक बोझिल
स्याह चुप्पी बो गया।



(9) इस शहर में




पत्थरों के
इस शहर में
मैं जब से आ गया हूँ
बहुत गहरी
चोट मन पर
और तन पर खा गया हूँ ।

अमराई को न
भूल पाया
न कोयल की ॠचाएँ,
हृदय से
लिपटी हुई हैं
भोर की शीतल हवाएँ ।

बीता हुआ
हर एक पल
याद में मैं पा गया हूँ ।

शहर लिपटा
है धुएँ में
भीड़ में
सब हैं अकेले,
स्वार्थ की है
धूप गहरी
कपट के हैं
क्रूर मेले ।

बैठकर
सुनसान घर में
दर्द मैं सहला गया हूँ ।



(10)बच्चे और पौधे




लहलाते रहेंगे
आँगन की क्यारियों में
हिलाकर नन्हें- नन्हें पात
सुबह शाम करेंगे बात
प्यारे पौधे ।

पास आने पर
दिखलाकर पंखुड़ियों की
नन्हीं-नन्हीं दतुलियाँ
मुस्काते हैं
फूले नहीं समाते हैं
ये लहलाते पौधे ।

मिट्टी, पानी और उजाला
इतना ही तो पाते
फिर भी रोज़ लुटाते
कितनी खुशियाँ !
बच्चे-
ये भी पौधे हैं
इन्हें भी चाहिए
प्यार का पानी
मधुर–मधुर स्पर्श की मिट्टी
और दिल की
खुली खिड़कियों से
छन-छनकर आता उजाला
तब ये भी मुस्काएँगे
अपनी किलकारियों का रस
ओक से हमको पिलाएँगे
जब भी स्नेह–भरा स्पर्श पाएँगे
बच्चे पौधे, पौधे बच्चे
बन जाएँगे
घर आँगन महकाएँगे ।
0


जन्म : 19मार्च 1949, बेहट जिला सहारनपुर, भारत में।शिक्षा : एम ए , बी एड प्रकाशित रचनाएं : 'माटी, पानी और हवा', 'अंजुरी भर आसीस', 'कुकडूँ कूँ', 'हुआ सवेरा' (कविता संग्रह), 'धरती के आंसू', 'दीपा', 'दूसरा सवेरा' (लघु उपन्यास), 'असभ्य नगर' (लघुकथा संग्रह), अनेक संकलनों में लघुकथाएँ संकलित तथा गुजराती, पंजाबी, उर्दू एवं नेपाली में अनूदित।संप्रति : प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय हज़रतपुर, फ़िरोज़ाबाद (उ.प्र.) ई मेल -rd_kamboj@yahoo.com

Friday, March 7, 2008

वाटिका- मार्च 2008

दस ग़ज़लें – लक्ष्मी शंकर वाजपेयी

1



पूछा था रात मैंने ये पागल चकोर से
पैगाम कोई आया है चन्दा की ओर से

बरसों हुए मिला था अचानक कभी कहीं
अब तक बंधा हुआ है जो यादों की डोर से

मुझको तो सिर्फ उसकी ख़ामोशी का था पता
हैरां हूँ पास आ के समंदर के शोर से

मैं चौंकता हूँ जब भी नज़र आए है कोई
इस दौर में भी हंसते हुए ज़ोर ज़ोर से

ये क्या हुआ है उम्र के अंतिम पड़ाव पर
माज़ी को देखता हूँ मैं बचपन के छोर से

2


टूटते लोगों को उम्मीदें नयी देते हुए
लोग हैं कुछ, ज़िंदगी को, ज़िंदगी देते हुए

नूर की बारिश में, जैसे, भीगता जाता है मन
एक पल को भी, किसी को, इक ख़ुशी देते हुए

याद बरबस आ गई माँ, मैंने देखा जब कभी
मोमबत्ती को पिघल कर, रोशनी देते हुए

आज के इस दौर में मिलते है ऐसे भी चिराग़
रोशनी देने के बदले, तीरगी देते हुए

इक अमावस पर ये मैंने रात के मुँह से सुना
चाँद बूढ़ा हो चला है, चाँदनी देते हुए

3


जब भी वीरान सा, ख्वाबों का नगर लगता है
कितना दुश्वार, ये जीवन का सफर लगता है

इक ज़माने में, बुरा होगा फ़रेबी होना
आज के दौर में, ये एक हुनर लगता है

कैसा चेहरा ये दिया, आदमी को शहरों ने
कोई हमदर्दी भी जतलाए, तो डर लगता है

जिसकी हर ईंट, जुटायी थी लहू से अपने
कितना बेगाना, उसे अपना वो घर लगता है

भोलापन तुझमें, वही ढूँढ़ रही हैं नज़रें
अब मगर तुझपे ज़माने का असर लगता है

हम तो हर आंसू को शब्दों में बदल देते हैं
बस यही लोगों को, ग़ज़लों का हुनर लगता है

यूं कड़ी धूप में लिपटाया छांव से मुझको
माँ के आँचल सा ये अनजान शजर लगता है

4


न जाने चाँद पूनम का, ये क्या जादू चलाता है
कि पागल हो रहीं लहरें, समुन्दर कसमसाता है

हमारी हर कहानी में, तुम्हारा नाम आता है
ये सबको कैसे समझाएं कि तुमसे कैसा नाता है

ज़रा सी परवरिश भी चाहिए हर एक रिश्ते को
अगर सींचा नहीं जाए तो पौधा सूख जाता है

ये मेरे और ग़म के बीच में किस्सा है बरसों से
मैं उसको आज़माता हूँ वो मुझको आज़माता है

जिसे चींटी से लेकर चाँद सूरज सब सिखाया था
वही बेटा बड़ा होकर सबक़ मुझको पढ़ाता है

नहीं है बेइमानी गर ये बादल की तो फिर क्या है
मरूस्थल छोड़कर जाने कहाँ पानी गिराता है

पता अनजान के किरदार का भी पल में चलता है
कि लहजा गुफ्तगू का भेद सारे खोल जाता है

खुदा का खेल ये अब तक नहीं समझे कि वो हमको
बनाकर क्यों मिटाता है, मिटाकर क्यूं बनाता है

वो बरसों बाद आकर कह गया फिर जल्दी आने का
पता माँ बाप को भी है, वो कितनी जल्दी आता है


5

पिंजरे में वो परिन्द, यही सोचता रहा
छूना था आसमान, मगर क्या से क्या हुआ

वीरान जज़ीरे पे खड़ा, देख रहा हूँ
हर ओर अंतहीन समुंदर का सिलसिला

हम अपनी सफ़ाई में कभी कुछ न कहेंगे
इक रोज़ वक्त खुद ही सुना देगा फ़ैसला

लोगों की शक्ल में ये महज़ जिस्म बचे हैं
रूहें तो जाने कब की हो चुकी हैं गुमशुदा

ये बेतहाशा तेज़ भागते हुए से लोग
मंजि़ल कहाँ हैं इनकी इन्हें भी नहीं पता

जो ज़िंदगी को जीते रहे अपनी तरह से
ये सिर्फ वो ही जानते हैं उनको क्या मिला

अच्छा कहा किसी ने, किसी ने बुरा कहा
मैं तो वही था, जैसा था अच्छा था या बुरा

रिश्तों को मत बना या मिटा खेल समझकर
रिश्ते बना तो आख़िरी दम तक उन्हें निभा


6
इतनी किसी की ज़िंदगी ग़म से भरी न हो
वो मौत माँगता हो, मगर मौत भी न हो

ख़ंजर के बदले फूल लिए आज वो मिला
डरता हूं कहीं चाल ये उसकी नई न हो

बच्चों को मुफ़लिसी में, ज़हर माँ ने दे दिया
अख़बार में अब ऐसी ख़बर फिर छपी न हो

ऐसी शमा जलाने का क्या फायदा मिला
जो जल रही हो और कहीं रोशनी न हो

हर पल, ये सोच सोच के नेकी किए रहो
जो सांस ले रहे हो, कहीं आख़िरी न हो

क्यूँ ज़िंदगी को ग़र्क किए हो जुनून में
रक्खो जुनून उतना कि वो ख़ुदकुशी न हो

ऐसे में क्या समुद्र के तट का मज़ा रहा
हो रात, साथ वो हों, मगर चाँदनी न हो

एहसास जो मरते गए, दुनिया में यूं न हो
दो पांव के सब जानवर हों, आदमी न हो

इस बार जब भी धरती पे आना ए कृष्ण जी,
दो चक्र ले के आना, भले बाँसुरी न हो


7
खिड़कियाँ, सिर्फ, न कमरों के दरमियां रखना
अपने ज़ेहनों में भी, थोड़ी सी खिड़कियां रखना

पुराने वक्तों की मीठी कहानियों के लिए
कुछ, बुजु़र्गों की भी, घर पे निशानियां रखना

ज़ियादा ख़ुशियाँ भी मगरूर बना सकती हैं
साथ खुशियों के ज़रा सी उदासियां रखना

बहुत मिठाई में कीड़ों का डर भी रहता है
फ़ासला थोड़ा सा रिश्तों के दरमियां रखना

अजीब शौक़ है जो क़त्ल से भी बदतर है
तुम किताबों में दबाकर न तितलियां रखना

बादलो, पानी ही प्यासों के लिए रखना तुम
तुम न लोगों को डराने को बिजलियां रखना

बोलो मीठा ही मगर, वक्त ज़रूरत के लिए
अपने इस लहजे में थोड़ी सी तल्ख़ियां रखना

मशविरा है, ये, शहीदों का नौजवानों को
देश के वास्ते अपनी जवानियां रखना

ये सियासत की ज़रूऱत है कुर्सियों के लिए
हरेक शहर में कुछ गंदी बस्तियां रखना

8


फूल काग़ज़ के हो गए जब से,
ख़ुशबुएँ दर-ब-दर हुईं तब से

कुछ किसी से भी मांगना न पड़े,
हम ने मांगा है बस यही रब से

जब से पानी नदी में आया है
हम भी प्यासे खड़े हैं बस तब से

बेटियाँ फि़क्रमंद रहती हैं
बेटे रखते हैं, काम मतलब से

ज़िन्दगी को मयार कैसे मिले
हमने सीखा है ग़म के मक़तब से

लाख धोखा है उसकी बाज़ीगरी
लोग तो ख़ुश हैं उसके करतब से


9


बदनीयतों की चाल, परिन्दे को क्या पता
फैला कहाँ है जाल, परिन्दे को क्या पता

लोगों के, कुछ लज़ीज़, निवालों के वास्ते
उसकी खिंचेगी खाल, परिन्दे को क्या पता

इक रोज़ फिर उड़ेगा कि मर जाएगा घुटकर
इतना कठिन सवाल, परिन्दे को क्या पता

पिंजरा तो तोड़ डाला था, पर था नसीब में
उससे भी बुरा हाल, परिन्दे को क्या पता

देखा है जब से एक कटा पेड़ कहीं पर
है क्यूं उसे मलाल, परिन्दे को क्या पता

उड़ कर हजारों मील इसी झील किनारे
क्यूं आता है हर साल, परिन्दे को क्या पता

एक-एक कर के सूखते ही जा रहे हैं क्यों
सब झील नदी ताल, परिन्दे को क्या पता


10


दर्द से दामन ख़ूब भरा है
जीने का भरपूर मज़ा है

दु:ख क्या छू पाएगा उसको
साथ में जिसके माँ की दुआ है

आँसू आहें ग़म बेचैनी
प्यार की बस इतनी-सी सज़ा है

जान गया हूँ उसकी शरारत,
ख़त मुझको गुमनाम लिखा है

रात में चीखा एक मछेरा
चाँद नदी में डूब रहा है

खुल जा सिमसिम बोल के हारे
वो दरवाज़ा बन्द पड़ा है

ज़ुल्म का परचम ऊँचा क्यूं है
गर दुनिया का कोई ख़ुदा है

बेबस होकर जीने वाला
सच पूछो तो रोज़ मरा है



शिक्षा : एम.एस.सी(भौतिक विज्ञान)
संप्रति : भारतीय प्रसारण सेवा में अधिकारी
प्रकाशित संग्रह : बेजुबान दर्द, ख़ुशबू तो बचा ली जाए(ग़ज़ल संग्रह)
मच्छर मामा समझ गया हूँ (बाल कविताएं), खंडित प्रतिमाएं (प्रकाशनाधीन)
सम्पर्क : के–210, सरोजिनी नगर
नई दिल्ली–110023
दूरभाष :24676963(घर)
9899844933(मोबाइल)
ई मेल : lsbajpayee@rediffmail.com


Monday, February 18, 2008

दस कविताएं – सुरेश यादव

(1) चाहता हूँ जब

चाहता हूँ जब कभी मैं
सुगन्ध लिखना फूल की
भर लाते हैं
शब्द जाने कहाँ से
हजारों-हजार फूलों की घुटन

चाहता हूँ जब कभी मैं लिखना
धूप की गुनगुनाहट कविता में
अजीब-सा शोर बनकर रह जाती है
धूप में चटकते
माटी के बरतनों की टूटन

चाहता हूँ कि एकटक ताकता रहूँ
खिले-खिले ये इन्द्रधनुष
हर एक रंग लेकिन
कुछ ऐसा खेल खेलता है आँखों में
कि भरने लग जाती है चुभन

और
मैं–
लिख नहीं पाता हूँ
फूलों की सुगन्ध
धूप की गुनगुनाहट
इन्द्रधनुष के रंगों की खिलन।

(2) बिछा रहा जब तक


घिरा रहा
शुभ-चिन्तकों से
बिछा रहा
जब तक सड़क सा !

खड़ा हुआ तन कर
एक दिन
अकेला रह गया
दरख़्त-सा !


(3) धार पा गए


गर्म दहकती भट्टी में
पड़े रहे तपते हुए
और– एक दिन
ढलने का अहसास पा गए

संभव और कुछ नहीं था
इस हालात में
गर्म थे
पिटे खूब
और – एक दिन
धार पा गए।


(4) अपनी जड़ें लेकर

सूख चुके हैं
समय की धूप में
पौधे – वे तमाम
रोपा था तुमने,
बहुत फुरसत में जिन्हें
स्नेह के साथ
लेकिन, खूबसूरत पत्थरों पर

नफरत में भरकर
जिन्हें कभी
जड़ों समेत उखाड़ा
और तुमने कीचड़ में फेंक दिया था
वे जहाँ-जहाँ गिरे
उठे जड़ें लेकर
और खड़े हो गए तन कर
दरख़्त बनकर।


(5) उखड़े दरख़्त की जड़ें


आँधी जब आती है
पेड़ों को हिलाती-डुलाती है
पत्तों को उड़ा कर अपने साथ
बहुत दूर तक ले जाती है

आँधी में जूझते भी पेड़ हैं
आँधी में टूटते भी पेड़ हैं
झकझोरती है आँधी जब दरख़्त को
उखाड़ देती जड़ों समेत
जड़ें उखड़े हुए दरख़्त की तब
आक्रोश में पैने पंजे की तरह तन जाती हैं
और –
आती हुई आँधी की
छाती में समाती चली जाती हैं।

(6) तिनके में आग


बरसाती मौसम का डर
अधबुना रह न जाए नीड़
चिड़िया को फिकर है

बेचैन हुई उड़ती
इधर से उधर
तिनके जुटाती
जलते चूल्हे से भी
खींचकर ले गई तिनका
बुन रही है
नीड़ में जिसको जल्दी-जल्दी !

आग है तिनके में
और
चिड़िया– आग से बेखबर है
चिड़िया को बस
नीड़ की फिकर है।

(7) परिन्दे


हवाओं के हाथों में
देखे हैं
इन परिन्दों ने
जब से पैने खंजर
खोले और पसार दिए पंख

ये परिन्दे
उड़ाने ऊँची भरते हैं
हवा से बातें करते हैं

पंजों में धरती
पंखों पर आकाश
ये परिन्दे
जब चीं-चीं, चीं-चीं करते हैं
मौसम
इनके पंखों से झरते हैं

आग बरसाता सूरज हो
या बादलों की बरसात हो तेजाबी
परिन्दे उड़ते हैं

नीड़ जब से उजड़े हैं
इन परिन्दों के
उड़ते-उड़ते साते हैं
ये उड़ते-उड़ते जगते हैं
पूरे आसमान को
ये परिन्दे
अपना घर कहते हैं।

(8) बिकने लगा सूरज


लोग हैं कुछ
सूरज को भी जो
बेचने लगे हैं – अपनी दुकानों पर

बहुत लोग हैं
जो खड़े हैं इन्तजार में
आएगी धूप भी
उनके मकानों पर

बहेलियों के हाथों
जाल मचलने लगे हैं
परिन्दों की भूख ने
निगाहें उनकी
गिरा दी हैं– साजिश के दानों पर

कैसा हक मिलेगा
उड़ते इन परिन्दों को
फैसला लिखने वाले अब
कमानों पर चढ़ाकर तीर
चढ़ चुके हैं ऊँचे मचानों पर।


(9) वादे

उम्र भर
संग चलने के वादे
कितनी जल्दी थक जाते हैं
दो चार कदम चलते
रुक जाते हैं

ज़िन्दगी की राह
इतनी उबड़-खाबड़ है कि
वादों के नन्हें-नन्हें पांव
डग नहीं भर पाते

कोई भी मोड़
बहाने की तरह
खड़ा मिल जाता है इनको
और
वादे– बहाने की उंगली थाम कर
जाने कहाँ चले जाते हैं।


(10) ज़मीन

मेरी कविताओं की ज़मीन
उस आदमी के भीतर का धीरज है
छिन चुकी है
जिसके पांवों की ज़मीन

भुरभुरा उर्वर किये हैं
इस ज़मीन को
हरियाते घावों की दुखन

इस ज़मीन का रंग
खून का रंग है
इस ज़मीन की गंध
देह की गंध है
इस ज़मीन का दर्द
आदमी का दर्द है

इसलिए
कुछ नहीं होता जब
ज़मीन पर
तब– दर्द की फसल होती है
और– मैं इसी फसल को
बार-बार काटता हूँ
हर बार बोता हूँ।

इस तरह आदमी के रिश्ते को
कविता में ढोता हूँ
और
आदमी को कभी नहीं खोता हूँ।
0

जन्म:1 जनवरी, 1955, मैनपुरी(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा:एम.ए. हिन्दी एवं राजनीति शास्त्र।
कृतियाँ: उगते अंकुर(कविता संग्रह)
दिन अभी डूबा नहीं(कविता संग्रह)
यह शहर किसका है(कविता संग्रह)(शीघ्र प्रकाश्य)
सम्मान:‘दिन अभी डूबा नहीं’ कविता संग्रह पर हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा वर्ष 86-87 का ‘साहित्यिक कृति पुरस्कार’ एवं अन्य सम्मान।
सम्प्रति: निदेशक, दिल्ली नगर निगम, दिल्ली।

कवि सम्पर्क:
2/3, एम सी डी फ्लैट्स,
साउथ एक्स, पार्ट–।।,
नई दिल्ली–110065
दूरभाष:011–26255131(निवास)
09818032913(मोबाइल)
ई मेल:sureshyadav55@gmail.com

Friday, January 11, 2008

दस कविताएं - नव वर्ष 2008

गुस्ता





दस कविता पुष्पों से सजा यह “गुलदस्ता” वाटिका परिवार की ओर से नव वर्ष की अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ...


(1)जो कुछ भी हो बेमिसाल हो...
शेरजंग गर्ग


जो कुछ भी हो बेमिसाल हो
सुलझा-सुलझा हर सवाल हो
नया रंग हो, नया हाल हो
नए साल में यह कमाल हो।

जो कुछ भी हो बेमिसाल हो।

आतंकित आतंकवाद हो
हंसी-खुशी हो, निर्विवाद हो
प्रेम-प्यार का पाठ याद हो
मानवता का जय-निनाद हो

जो कुछ भी हो बेमिसाल हो।

सच्चे जीतें, झूठे हारें
देश-जाति का रूप निखारें
सबका स्वागत करें बहारें
केवल अच्छी बात विचारें

जो कुछ भी हो बेमिसाल हो।

पर क्या होगा, कहना मुश्किल
मिल पाएगी कैसे मंजिल
टूटेगा या खुश होगा दिल
फिर भी सोचें-चाहें हिलमिल

जो कुछ भी हो बेमिसाल हो।
नए साल में यह कमाल हो।


संपर्क :
एच–43, ग्राउंड फ्लोर
साउथ एक्सटेंशन, पार्ट–1
नई दिल्ली–110049
दूरभाष :011-24644499
09811993230


(2) इस नए साल में
लक्ष्मी शंकर वाजपेयी

इस नए साल में, कामना है यही
धुंध के बीच कुछ रोशनी भी मिले
दर्दो ग़म हादसे रोज की हैं ख़बर
इनसे हटकर ज़रा सी खु़शी भी मिले।

यूं तो कहने को आबाद हैं बस्तियां
भीड़ ही भीड़ है, शोर ही शोर है
बोलती, चलती, फिरती मशीनें तो हैं,
काश इनमें कोई आदमी भी मिले।

जिस तरफ़ देखिए झूठ, धोखाघड़ी
बेइमानी के हैं बेशरम कहकहे
हर तरफ़ ही दिखे सब गलत ही गलत
थोड़ा-सा कुछ कहीं पर सही भी मिले।

वे जो कहने को जिन्दा भले हैं मगर
ज़िन्दगी से नहीं जिनकी पहचान तक
वे जो घुट-घुट के मरते हैं हर एक पल
उनको सचमुच की कुछ ज़िन्दगी भी मिले।


संपर्क : के–210
सरोजिनी नगर
नई दिल्ली–110023
दूरभाष :011-24676963
09899844933
ई मेल :lsbajpayee@rediffmail.com


(3) नए साल का बयान
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’


मैं बार-बार आऊँगा
लेकर फूलों का हार
तुम्हारे द्वार।

जितने भी कांटे पथ में
बिखरे हुए पाऊँगा
आने से पहले मैं
ज़रूर हटाऊँगा।

मैं बार-बार आऊँगा।

बहुत है अंधेर जग में
आंगन में, देहरी पर
जहां तक हो सकेगा
दीपक जलाऊँगा।

मैं बार-बार आऊँगा।

मुस्कानों की खुशबू को
बिखेर हर चेहरे पर
सूरज की चमक सदा
हर बार बिखराऊँगा।

मैं बार-बार आऊँगा।

संपर्क :
प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय
ओ ई एफ, हजरतपुर
जिला–फिरोजाबाद–293103
उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 09319806777
ई मेल :rdkamboj@gmail.com


(4) नव वर्ष अभिनंदन
डा. केवल कृष्ण पाठक

नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदन
सौरभमय हो जैसे चंदन।

हो सबके मन में उजियारा
घर-घर में बरसे सुखधारा
तेरे आने पर सब खुश हों
कोई न हो भूख का मारा

जन-मन में कभी न हो क्रंदन।

अब करे न कोई घोटाला
आतंक, प्रदूषण पर ताला
हो दृढ़ निश्चयी प्रत्येक व्यक्ति
हो राष्ट्रप्रेम का मतवाला

करने धरती माँ का वंदन।

सब जग में भाई चारा हो
मन मंदिर में उजियारा हो
सब लोग द्वे्ष से दूर रहें
नयनों में प्रेम की धारा हो

आनंद मुदित हो सबका मन।

कवि संपर्क :
343/19
आनन्द निवास, गीता कालोनी
जीन्द–126102(हरियाणा)


(5) अबके बरस
राजेन्द्र पासवान ‘घायल’

हर तरफ़ किलकारियां हों, कहकहे अबके बरस
प्यार की ऐसी हवा, हर दिन बहे अबके बरस

सारी दुनिया में रहे मुहब्बत की दीवानगी
हम रहें सुख-चैन से, दुनिया रहे अबके बरस

आदमी हर आदमी के काम आए इस तरह
जो पराया हो उसे अपना कहे अबके बरस

पेड़ से लिपटी लताएं चैन से लिपटी रहें
गुल रहे, गुलशन रहे, खुशबू रहे अबके बरस

चांदनी जैसा मज़ा आए अमा की रात में
इस तरह आंगन गली रोशन रहे अबके बरस

नफ़रतों की आग में ‘घायल’ कोई झुलसे नहीं
प्यार की पुरवाई सालों भर बहे अबके बरस

संपर्क :
प्रबंधक, राजभाषा कक्ष
भारतीय रिजर्व बैंक
पटना–800001
दूरभाष : 09431820529
मेल-rajbhashapatna@rbi.org.in



(6)नए वर्ष के स्वागत में
अलका सिन्हा


डिस्को की थिरकती ब​त्तियों के बीच
देर रात तक जश्न मना, जाम टकराये
और डूब गया
वर्ष का आख़िरी सूरज
ग्रीनविच रेखा पर
बारह बजने के साथ ही
बदल गया कैलेंडर
समूची दुनिया में गूंजने लगा–
हैप्पी न्यू ईअर का संगीत...

मगर इस हल्ले-हंगामे से बेख़बर
दूर गांव में एक औरत
रतजगे में बैठी
अखंड दीप जलाये
कर रही है कामना
अदृश्य शक्तियों से
शहर पढ़ने गई
अपनी बेटी की रक्षा के लिए।

रोशनी की जंगली चकाचौंध के बीच
महसूस कर रही हूँ अपने इर्द-गिर्द
उसकी प्रार्थनाओं का रक्षा कवच
रात का अंधेरा छंट रहा है
पौ फट रही है
मैं महसूस कर रही हूँ
कि नए वर्ष